बातें एहसासों की
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गुरुवार, 15 जनवरी 2026
आलेख- बचपन क्यों नहीं बचपन जैसा
मंगलवार, 26 जनवरी 2021
72 Republic Day
72nd Republic day poem
गुरुवार, 14 जनवरी 2021
Happy lohri
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020
अध्यापक की आकांक्षा
शुक्रवार, 28 अगस्त 2020
आलेख-कमाऊ स्त्री एक शोध
सोमवार, 24 अगस्त 2020
बौद्धिकता,महिला और समाज
बौद्धिकता,महिला और समाज
आज हम 21वीं सदी में विचरण कर रहें हैं चारो ओर दृष्टि डालने पर विकासशील समाज का बिम्ब नज़र आता है।अगर हम बौद्धिक विकास या ज्ञान की बात करें तो अगिनित दार्शनिक हज़ारों उदाहरण देते समक्ष खड़े होते हैं।महिला सशक्तिकरण की बड़ी बड़ी दलीले दी जाती हैं।नारी को शक्ति का स्थान दिया जाता है परन्तु बातों मैं या उदाहरणों में ही। स्त्री को गृह लक्ष्मी कह कर पुकारा जाता है।निश्चित तौर पर अपने आप से ही प्रश्न किया जाए कि क्या यथारता स्त्री को वह स्थान मन से दे पाते हैं। कहा भी गया है-‘जिस घर में स्त्री नहीं वह केवल चार दीवारों का मकान है।
एक नववधू जब अपने ससुराल की दहलीज से होती हुई अपने जीवन साथी के साथ भीतर आ रही होती है तो न जाने कितने ही सपने दोनों संजोये शगुन की पूर्ति करते हुए प्रवेश करते हैं।जाने कब वह सब सपने कहीं पीछे छूट जाते हैं और दोनों के मध्य आना कानी शुरू हो जाती है।धीरे-धीरे यह हिंसा का रूप ले लेती है।यही घरेलू हिंसा है।घरेलू हिंसा केवल शारीरिक दुर्र्व्यवहार ही नही होती बल्कि अपने साथी को भावनात्मक रूप से परेशान करना,मौखिक रूप से गाली -गलौच करना,आर्थिक तंगी देना,बलात यौन शोषण जैसे विभिन्न रूप है। पुरुषात्मक समाज में पुरुष महिला को दबाब में रखने को ही अपना बड़पन समझते हैं। कारण कुछ भी हो पुरुष आवेश में आकर झट से स्त्री का गला पकड़-दबोच लेते है।
घरेलू हिंसा होने के निम्नलिखित कारण होते हैं:-
• अहँकार
• पारिवारिक समस्या
• दहेज की समस्या
• विवाहेतर दूसरे पुरुष से सम्बंध
• मानसिकता का न मिलना
• नशीले पदार्थों का सेवन
• सामंजस्य की कमी
• संदेह
• यौन शोषण
• आर्थिक प्रतिद्वंदता
दहेज एक प्रमुख कारण है। दहेज को लेकर आये दिन कितनी ही गृह लक्ष्मियाँ प्रताड़ित की जाती हैं।अपने आप को बौद्धिकता के उदाहरण समझने वाले पढे-लिखे लोग भी दहेज को लेकर घरेलू हिंसा समाज की नज़र से बचने के लिए वह शारीरिक यातनाएं न देते हुए भावनात्मक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं।
कितनी ही बार अहंकार भी हिंसा का कारण बनता है।कईं बार स्त्री अगर पुरुष से अधिक कमाती हो या उसे अत्याधिक तारीफ मिलती हो तो पुरुष स्वयं को dominant महसूस करता है तो भी वह आवेश में आकर हिंसा पर उतारू हो जाता है।
नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले पुरुष unconscious होकर घर पर तोड़ फोड़ और महिलाओं पर हाथ उठाते हैं।
अतः घरेलू हिंसा का कारण कोई भी हो लेकिन इसका अधिकार किसी भी व्यक्ति को नहीं हैं।मुशिकलों के हल खोजने की आवयश्कता है और अत्याचार करने वाले से अत्याचार सहने वाला बड़ा होता है। इस स्थिति में कानों7 की मदद लेनी चाहिए।हर व्यक्ति को घरेलू हिंसा संबंधित कानूनों की जानकारी हिनी चाहिए।
महिला संकरक्षण अधिनियम 2005 महिलाओं के लिए है।
धारा 5,6,7 आदि के अनुसार महिलाएं उन पर होने वाले शोषण के खिलाफ आवज़ उठा कर कानून की मदद ले सकती है।महिलाओं के लिए जगह-जगह पर वीमेन सेल भी बने हुए है।
Name :- Rajni Sharma (writer)
Designation:- J&k state govt. Teacher
गुरुवार, 20 अगस्त 2020
’’मैं पूछती हूँ’’
बुधवार, 19 अगस्त 2020
"बेटियों की उड़ान को विकल्प न बनायें"
"बेटियों की उड़ान को विकल्प न बनायें"
प्रकृति की खूबसूरत रचना बेटी जो संस्कृति की रक्षक एवं वाहिका भी होती है। दो परिवारों को संस्कारवान बनाने में मुख्य भूमिका निभाती हैं। प्रत्येक त्यौहार,पर्व,व्रत,विवाह आदि जैसी जिम्मेदारियों को पूरे विधि-विधानुसार निभाती हैं। कन्या पूजन से लेकर धार्मिक परम्पराओं से सम्बंधित यज्ञ,हवन आदि में भी पति के साथ बैठकर यज्ञ आहुति देती है।
21वीं सदी की बेटियाँ घर की देहरी से निकलकर प्रत्येक क्षेत्र में सफलता हासिल कर रही हैं। वे आत्म निर्भर,आत्म स्वावलम्बी बनकर समाज में एक नयी इबारत लिख रही हैं।
एक समय था जब बेटी के जन्म लेने पर माता-पिता उदास हो जाया करते थे परन्तु आज बेटियों ने हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़े हैं वे साबित करने में सक्षम रही हैं कि वे भी बेटों से पीछे नहीं हैं। घर की चाहरदीवारी के बाहर भी उनकी एक पहचान है। आज बेटियों के प्रति अभिभावकों का नज़रिया बदल रहा है।
आज भी जब बेटियों की शिक्षा तथा सहयोग पर चर्चा एवं विचार-विमर्श किया जाता है तो प्रेरणा हेतु किरण बेदी,इंदिरा गाँधी,सानिया मिर्ज़ा,गीता फौगत इत्यादि जैसे नाम सर्वप्रथम जुबान पर आ जाते है और हमारे देश की इन बेटियों पर गर्व महसूस होता है। जिनका भारत की तस्वीर बदलने में कुछ अंशों तक हाथ रहा है। उदाहरण के रुप में यह ऐसे नाम भी है जो बेटियों की उड़ान के विकल्प पर प्रश्न चिन्ह भी लगाते हैं जैसे सानिया मिर्ज़ा,इंदिरा गाँधी आदि प्रसिद्ध नाम जिनके परिवार में भाई नही थे। कहीं न कहीं मस्तिष्क में विचारों की एक परत ऐसी भी बनती है जो विचारने पर मजबूर करती है कि परिवार में बेटा न होने के कारण बेटियों को उड़ान कहीं विकल्प के रुप में तो नहीं दी गयी। परन्तु इन बातों को नकारते हुए दूसरी ओर बेटियों की सफलता पर परिचर्चा करते समय या उदहरण देते हुए लोक सभा अध्यक्ष मीरा कुमार,निर्देशक एकता कपूर , वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त, खिलाड़ी साईना नेहवाल,प्रसिद्ध भारतीय लेखिका अरुंधती राय आदि के नाम प्रेरणा रुप सामने आते हैं जिनके परिवार में भाई होने के बावजूद भी उन्हें उनके अभिभावकों का भरपूर सहयोग मिला।राहों में आती कठिनाइयों को बिना डर के पीछे धकेलती रहीं। अभिभावकों का कर्तव्य बनता है वह अपनी बेटियों को कभी एहसास न होने दें कि घर में बेटा होना ज्यादा आवश्यक है ।बेटा-बेटी दोनों की उड़ान को एक आकाश प्रदान करें न कि इतेफाक बनाएं।
कल को बेहतर बनाने के लिए बेटियों को बचाना जरुरी है। बेटियां हमारी अमूल्य धरोहर है। उनके स्व एवं अस्मिता को बचाए रखना हमारा कर्तव्य बनता है। आज भी बहुत से लोगों की दकियानूसी विचारधारा है वे बेटों को ही तवज्जों देते हैं और बेटियों को या तो भ्रूण में खत्म कर देते हैं अन्यथा जन्म लेने के बाद उनका सही से पालन पोषण नहीं करते । अत: उन अभिभावकों को बेटी के जन्म पर केवल यह सोचना चाहिए कि हमारी बेटी भी कल की कल्पना चावला,मैरीकॉम, प्रतिभा पाटिल आदि जैसी बनकर हमारा और हमारे राष्ट्र का नाम गौरवन्तित करेंगी।
रजनी शर्मा (लेखिका)
मंगलवार, 18 अगस्त 2020
अध्यापकों के हाव-भावों का विद्यार्थियों पर प्रभाव
आलेख
आलेख- बचपन क्यों नहीं बचपन जैसा
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कमाऊ स्त्री - एक शोध एक ओर तो नारी सशक्तिकरण के द्वीप प्रज्वल्लित होते रहने की कामना आज सारा समाज करता है। बेटी पढ़ाओ,बेट...


