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शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

आलेख-कमाऊ स्त्री एक शोध


                   कमाऊ स्त्री - एक शोध
एक ओर तो नारी सशक्तिकरण के द्वीप प्रज्वल्लित होते रहने की कामना आज सारा समाज करता है। बेटी पढ़ाओ,बेटी बचाओ ,बेटियों को स्वंय के पैरों पर खड़े करने जैसी मानसिकता आज के अभिभावकों के सर पर चढ़ कर बोल रही है। महिलाए पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर कार्यक्षेत्रों में सफलता के झण्डें सतत् गाढ़ रही रही हैं। कुछ कामघार महिलाओं से उनके जीवन और उनसे सम्बंधित संबंधों के बारे में पूछा गया तो सबके विभिन्न अनुभव थे।किन किन दबावो और विचारों के बीच घूमती उनकी सोच जो शायद कभी सामने आ जाती है तो कभी दम घोट लेती है।समाज को सुखद अनुभव दर्शाने वाली कामघार महिलाएं किन परिस्थितियों के मध्य जीवन जीती हैं। कुछ भाव जो परिवार और समय की उधेड़बुन में दमित होकर नव भावों के मध्य धीमी साँसे लेते रहते हैं।न तो उन भावों को कोई समझना चाहता है और न ही कोई समझने.बुझने का प्रयास करत है।सम्भवत: यह लेख उन भावों एवम् जरूरतों को जुबान देने का माध्यम बन सके।
कामघार महिलाएं,सम्बन्ध और चुनोतियाँ:-
* फीके पड़ते अधिकार
* बेबुनियादी शक का घेरा
* सबंध और उनकी आकांक्षाएं
* ईर्ष्या की भावना
अधिकतर  कामघार महिलाओं का कहना था  घर परिवार पर होने वाले व्यय की जिम्मेवारी लेने में उनके पति आँख मिचौनी का खेल खेलते हैं। अपना अधिकार हम पर तो समझते हैं परन्तु हमारी आकांक्षाएं कहीं न कहीं समय क साथ लुप्त हो जाती हैं एवम् अधिकार फीके पड़ जाते हैं।और आपसी रिश्तों में मेरा तेरा जैसी भावनाएं उत्पन्न होने लगती हैं।
                कितने रिश्ते सन्देह के आधार पर बली चढ़ जाते हैं। कामकाजी महिलाओं से बात करने पर पता चला ज्यदातर महिलाएं संदेह रुपी समस्या से आये दिन रूबरू हो रही हैं।उनके फ़ोन पर बात करते वक्त घरवालों की नजरें कहीं निशाना कहीं जैसे रोज़ की बात हो गयी है।राह गुजरते कोई कार्यकारी मिल जाए तो बाल की खाल उतारने लग जाते हैं।ऐसा लगता है मानो आत्मा बेबुनियादी शक की चिता में जल रही हो।
            जब एक लड़की 20.25 वर्ष अपने माता.पिता के पास रहती है वहीं पलती और आँखों में जाने कितने सपने लिए बड़ी होती है। जब बात विवाह की आती है तो मन ही मन वह अपने एक और माता पिता की छवि अपने मन में बनाने लग जाती है। उसे लगता है उसके पिता से अधिक प्रेम करने वाला जीवन साथी उसे मिलने वाला है जाने कितनी आशायें आकांक्षाएं लिए वह ख़ुशी .ख़ुशी अपने पति के घर  आ जाती है।वह बेझिझक अपनी जरूरतों को अपने पति को बताती है परन्तु इस शोध से यहां चीजें विपरीत दिशा में नज़र आती हैं।कुछ कामघार महिलाओं से बात करने पर पता चला ज्यदातर महिलाओं का कहना था वह अपनी जरूरतों को स्वयं पूरा करने में ही आनंद का अनुभव करती हैं वे अपने अधिकार पर झिझक महसूस करती हैं।आकांक्षाएं तो  कहीं किसी समय रुपी पथरों के नीचे दब जाती हैं । जब उनके जीवनसाथी की आँखों और व्यवहार से यह झलकता हो की तुम भी तो कमाती हो। उस वक़्त हम कामघार महिलाएं अपनी तुलना घरेलू महिलाओं से करने लग जाती हैं जिनके पति उनकी हर जरुरत को अपनी जरुरत समझकर पूरा करते हैं।घरेलू महिलाएं कहीं बेहतर स्थिति पर नज़र आने लगती है। घर परिवार संबंधों की  आकांक्षाएं भी अपनी काम काजी बहु बेटी पर बरकरार रहती है । मगर उसकी इच्छाएं तेज हवा में उड़ते तिनके समान होती हैं जिसे कोई थाह नहीं मिल रही होती।
                कामघार महिलाओं की मासिक आमदनी भी कभी- कभार सबंधों में कड़वाहट उत्पन्न करने में जिम्मेवार होती हैं।परिवार में रहते हुए महिला की अधिक आमदनी ईर्ष्या की भावना जागृत करने में एहम भूमिका निभाती है। लड़ाई-झगड़ो का कारण भी बनती है। ईर्ष्या आपसी निजता एवम् प्रेम का गला घोटने का कार्य करती है। अलगाव की परिस्थितियां भी उतपन्न हो जाती हैं। जो दुःख का विषय है। 
   अतः समाज में रहते हुए अगर मनुष्य अपने सम्बन्धों की जिम्मेवारी  भली-भाँती पहचानते हुए जीवन यापन करे तो ऐसी परिस्थितियाँ कभी हमारे घर का दरवाजा नहीं खटखटायेंगी ।

सोमवार, 24 अगस्त 2020

बौद्धिकता,महिला और समाज

           बौद्धिकता,महिला और समाज

आज हम 21वीं सदी में विचरण कर रहें हैं चारो ओर दृष्टि डालने पर विकासशील समाज का बिम्ब नज़र आता है।अगर हम बौद्धिक विकास या ज्ञान की बात करें तो अगिनित दार्शनिक हज़ारों उदाहरण देते समक्ष खड़े होते हैं।महिला सशक्तिकरण की बड़ी बड़ी दलीले दी जाती हैं।नारी को शक्ति का स्थान दिया जाता है परन्तु बातों मैं या उदाहरणों में ही। स्त्री को गृह लक्ष्मी कह कर पुकारा जाता है।निश्चित तौर पर अपने आप से ही प्रश्न किया जाए कि क्या यथारता स्त्री को वह स्थान मन से दे पाते हैं। कहा भी गया है-‘जिस घर में स्त्री नहीं वह केवल चार दीवारों का मकान है।

                                  एक नववधू जब अपने ससुराल की दहलीज से होती हुई अपने जीवन साथी के साथ भीतर आ रही होती है तो न जाने कितने ही सपने दोनों संजोये शगुन की पूर्ति करते हुए प्रवेश करते हैं।जाने कब वह सब सपने कहीं पीछे छूट जाते हैं और दोनों के मध्य आना कानी शुरू हो जाती है।धीरे-धीरे यह हिंसा का रूप ले लेती है।यही घरेलू हिंसा है।घरेलू हिंसा केवल शारीरिक दुर्र्व्यवहार ही नही होती बल्कि अपने साथी को भावनात्मक रूप से परेशान करना,मौखिक रूप से गाली -गलौच करना,आर्थिक तंगी देना,बलात यौन शोषण जैसे विभिन्न रूप है। पुरुषात्मक समाज में पुरुष महिला को दबाब में रखने को ही अपना बड़पन समझते हैं। कारण कुछ भी हो पुरुष आवेश में आकर झट से स्त्री का गला पकड़-दबोच लेते है।

                            घरेलू हिंसा होने के निम्नलिखित कारण होते हैं:-

• अहँकार

• पारिवारिक समस्या

• दहेज की समस्या

• विवाहेतर दूसरे पुरुष से सम्बंध

• मानसिकता का न मिलना

• नशीले पदार्थों का सेवन

• सामंजस्य की कमी

• संदेह

• यौन शोषण 

• आर्थिक प्रतिद्वंदता

दहेज एक प्रमुख कारण है। दहेज को लेकर आये दिन कितनी ही गृह लक्ष्मियाँ प्रताड़ित की जाती हैं।अपने आप को बौद्धिकता के उदाहरण समझने वाले पढे-लिखे लोग भी दहेज को लेकर घरेलू हिंसा समाज की नज़र से बचने के लिए वह शारीरिक यातनाएं न देते हुए भावनात्मक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं।

                             कितनी ही बार अहंकार भी हिंसा का कारण बनता है।कईं बार स्त्री अगर पुरुष से अधिक कमाती हो या उसे अत्याधिक तारीफ मिलती हो तो पुरुष स्वयं को dominant महसूस करता है तो भी वह आवेश में आकर हिंसा पर उतारू हो जाता है।

                       नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले पुरुष unconscious होकर घर पर तोड़ फोड़ और महिलाओं पर हाथ उठाते हैं।

              अतः घरेलू हिंसा का कारण  कोई भी हो लेकिन इसका अधिकार किसी भी व्यक्ति को नहीं हैं।मुशिकलों के हल खोजने की आवयश्कता है और अत्याचार करने वाले से अत्याचार सहने वाला बड़ा होता है। इस स्थिति में कानों7 की मदद लेनी चाहिए।हर व्यक्ति को घरेलू हिंसा संबंधित कानूनों की जानकारी हिनी चाहिए।

महिला संकरक्षण अधिनियम 2005 महिलाओं के लिए है।

धारा 5,6,7 आदि के अनुसार महिलाएं उन पर होने वाले शोषण के खिलाफ आवज़ उठा कर कानून की मदद ले सकती है।महिलाओं के लिए जगह-जगह पर वीमेन सेल भी बने हुए है।



Name :- Rajni Sharma (writer)

Designation:- J&k state govt. Teacher


     


गुरुवार, 20 अगस्त 2020

’’मैं पूछती हूँ’’


’’मैं पूछती हूँ’’        
मैं पूछती हूँ सूरज से
क्या सीखाया अब तक तूने,
कहाँ है रोशनी जगत में
आज भी तो पाप के अंधेरों में
सो रही है मुहँ छिपाये कहीं दुनिया,
भ्रष्टाचार, दिखावा,निरादर,बाल शोषण
जैसी
अंतस दहलाने वाली सपर्-सी मानसिकता
बैठी है बिलों में,
वक्त-बेवक्त कब डस ले
कौन जाने।
मैं पूछती हूँ चाँद-से,
कहाँ है तेरी कहकशा,
थोड़ी ठंडक भी,
आज भी तो ज्वाला,ईष्यार्,द्वेष,
सीने से लगाये बैठे हैं जन,
कब कौन-सा खंजर घोंप दे,
कुचल दे भावनाओं को।
मैं पूछती हूँ दीपक से,
स्वंय जल जल कर भी तो
सिखा न पाया आलोक फैलाना,
आज भी तो औछी मानसिकता,
बुझा रही है दीप घरों के,
बेपरवाह,
मैं पूछती हूँ पुष्पों से,
बदलते मौसम के साथ,
कितनी ही बार तु जन्मा
फिर मुरझाया,
मंद समीर के झौंकों सेे
चारों दिशाओं में महकाया,
कितने असमथर् रहे
फिर भी सौरभ फैला न
पाये हृदय में,
आगे निकलने की होड़ में
मक्कारी,झूठे, अपशब्दों-सी
दुगर्ंध है सीनों में।

नामः- रजनी शर्मा 








बुधवार, 19 अगस्त 2020

"बेटियों की उड़ान को विकल्प न बनायें"

 "बेटियों की उड़ान को विकल्प न बनायें"

प्रकृति की खूबसूरत रचना बेटी जो संस्कृति की रक्षक एवं वाहिका भी होती है। दो परिवारों को संस्कारवान बनाने में मुख्य भूमिका निभाती हैं। प्रत्येक त्यौहार,पर्व,व्रत,विवाह आदि जैसी जिम्मेदारियों को पूरे विधि-विधानुसार निभाती हैं। कन्या पूजन से लेकर धार्मिक परम्पराओं से सम्बंधित यज्ञ,हवन आदि में भी पति के साथ बैठकर यज्ञ आहुति देती है।

21वीं सदी की बेटियाँ घर की देहरी से निकलकर प्रत्येक क्षेत्र में सफलता हासिल कर रही हैं। वे आत्म निर्भर,आत्म स्वावलम्बी बनकर समाज में एक नयी इबारत लिख रही हैं।

            एक समय था जब बेटी के जन्म लेने पर माता-पिता उदास हो जाया करते थे परन्तु आज बेटियों ने हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़े हैं वे साबित करने में सक्षम रही हैं कि वे भी बेटों से पीछे नहीं हैं। घर की चाहरदीवारी के बाहर भी उनकी एक पहचान है। आज बेटियों के प्रति अभिभावकों का नज़रिया बदल रहा है।

             आज भी जब बेटियों की शिक्षा तथा सहयोग पर चर्चा एवं विचार-विमर्श किया जाता है तो प्रेरणा हेतु किरण बेदी,इंदिरा गाँधी,सानिया मिर्ज़ा,गीता फौगत इत्यादि जैसे नाम सर्वप्रथम जुबान पर आ जाते है और हमारे देश की इन बेटियों पर गर्व महसूस होता है। जिनका भारत की तस्वीर बदलने में कुछ अंशों तक हाथ रहा है। उदाहरण के रुप में यह ऐसे नाम भी है जो बेटियों की उड़ान के विकल्प पर प्रश्न चिन्ह भी लगाते हैं जैसे सानिया मिर्ज़ा,इंदिरा गाँधी आदि प्रसिद्ध नाम जिनके परिवार में भाई नही थे। कहीं न कहीं मस्तिष्क में विचारों की एक परत ऐसी भी बनती है जो विचारने पर मजबूर करती है कि परिवार में बेटा न होने के कारण बेटियों को उड़ान कहीं विकल्प के रुप में तो नहीं दी गयी। परन्तु इन बातों को नकारते हुए दूसरी ओर बेटियों की सफलता पर परिचर्चा  करते समय  या उदहरण देते हुए लोक सभा अध्यक्ष मीरा कुमार,निर्देशक एकता कपूर , वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त, खिलाड़ी साईना नेहवाल,प्रसिद्ध भारतीय लेखिका अरुंधती राय  आदि के नाम प्रेरणा रुप सामने आते हैं जिनके परिवार में भाई होने के बावजूद भी उन्हें उनके अभिभावकों का भरपूर सहयोग मिला।राहों में आती कठिनाइयों को बिना डर के पीछे धकेलती रहीं। अभिभावकों का कर्तव्य बनता है वह अपनी बेटियों को कभी एहसास न होने दें कि घर में बेटा होना ज्यादा आवश्यक है ।बेटा-बेटी दोनों की उड़ान को एक आकाश प्रदान करें न कि इतेफाक बनाएं।

             कल को बेहतर बनाने के लिए बेटियों को बचाना जरुरी है। बेटियां हमारी अमूल्य धरोहर है। उनके स्व एवं अस्मिता को बचाए रखना हमारा कर्तव्य बनता है। आज भी बहुत से लोगों की दकियानूसी विचारधारा है वे बेटों को ही तवज्जों देते हैं और बेटियों को या तो भ्रूण में खत्म कर देते हैं अन्यथा जन्म लेने के बाद उनका सही से पालन पोषण नहीं करते । अत: उन अभिभावकों को बेटी के जन्म पर केवल यह सोचना चाहिए कि हमारी बेटी भी कल की कल्पना चावला,मैरीकॉम, प्रतिभा पाटिल आदि जैसी बनकर हमारा और हमारे राष्ट्र का नाम गौरवन्तित करेंगी।



रजनी शर्मा (लेखिका)


मंगलवार, 18 अगस्त 2020

अध्यापकों के हाव-भावों का विद्यार्थियों पर प्रभाव

अध्यापकों के हाव-भावों का विद्यार्थियों पर प्रभाव

 हमारी शिक्षा का इतिहास हमारी सभ्यता का भी इतिहास है I शिक्षा व्यवस्था के लगातार बदलाव,आधुनिक प्रणालियों का शिक्षा में उपयोग, विद्यार्थियों को अधिक-से-अधिक समझ आए और उनके समुचित विकास के लिए जो भी कदम उठाये जा रहे है वे स्पष्ट रूप से हमारी सभ्यता के विकास की रूपरेखा ही है I इस बीच सबसे अधिक ज़िम्मेदारी अगर दिखाई देती है तो वह है एक शिक्षक की।विद्यार्थी ही शिक्षकगण के दर्पण होते हैं जो उनका अनुसरण करते है एक विख्यात विद्यालय में कार्यरत होने से मुझे कई वर्कशॉप्स(कार्यशाला),सेमिनार(अध्यन्न गोष्ठियों) में जाने का अवसर मिलता रहा हैI शिक्षाविज्ञ अपने-अपने अनुभवों के अनुसार बहुत कुछ सिखाते I मैंने एक अध्यापक होने के नाते निजी स्तर पर विद्यार्थियों की मनोस्थिति पर एक शोध किया I इस शोध से विद्यार्थियों की मनोस्थिति को उच्च स्तर तक समझ सकी हूँ Iएक अध्यापक जिसका हमारे उज्ज्वल भविष्य के निर्माताओं का निर्माण करने में सर्वोत्कृष्ट योगदान होता है वह कहाँ चूकता है उसे जानने का प्रयास ही है यह आलेख |
शिक्षक का व्यक्तित्व विद्यार्थियों को सर्वप्रथम प्रभावित करता है | शिक्षक के हाव-भाव कहाँ तक विद्यार्थियों के मानस पटल पर एक सकारात्मक एवं नकारात्मक आधार भूमि का कार्य करते है और उनके आत्मविश्वास, मनोबल को घटाते एवं बढ़ाते है इसको जानने में यह आलेख सहायक होगा |
विद्यार्थियों के अनुसार :-  
नकारात्मक हाव-भावों का परिणाम
 जब अध्यापिका ज़ोर से बोलती है तो मुझे याद किया हुआ एक दम भूल जाता है और पैर कांपने लगते है|
 जब मैम गुस्से में होती है तो मैं अपने पढाई से संबन्धित संशयों का निवारण कभी नहीं करता।
 मेरी टीचर गुस्से वाली है मैं तो पूरा समय उसके चेहरे के हाव-भाव देखता रहता हूँ।मुझे डरावनी फिल्में अच्छी लगती हैं उनके लगातार बदलते हाव-भावों के कारण मुझे वह भी एक पात्र नज़र आती हैं। मैं कक्षा में ही भरपूर आनंद लेता हूँ।
 मैं पढने में थोड़ी कमज़ोर हूँ और लिखाई भी अच्छी नहीं है। अक्सर मेरे अभिवावक कहते हैं अपनी मेम से पूछा करो इतनी फीस देते हैं। परंतु मैं क्या करूँ मेरी टीचर तो टीचर जैसी नहीं हैं। मुझे देखते ही डांटने लगती है।
 मेरी अध्यापिका मेरी तारीफ करती है, मगर वह नहीं जानती मैं चुपचाप इसलिए बैठती हूँ क्योंकि मुझे उनसे डर लगता है। शौचालय जाना हो, तो भी मैं उनसे नहीं पूछती।
सकारात्मक हाव-भावों के परिणाम
 मेरी अध्यापिका तो मेरे प्रत्येक अभिवादन का उत्तर मुसकुराते हुए देती है जिससे मेरा मनोबल बढता है।
 हमारे विद्यालय में एक अध्यापिका हैं जो सबसे प्यार करती हैं मन करता है वह हमें भी कोई विषय पढाँए।
 मेरी विज्ञान की अध्यापिका से कितने ही प्रश्न पुछें वह हर बार हमारे संदेहों का निवारण उत्सुकता से करती है। उनके साथ सरलता का आभास होता है।
ये थे अध्यापकों के सकारात्मक एवं नकारात्मक हाव-भावों के विध्यार्थियों के मस्तिष्क पर गहरे आहत। इन सब बातों, बच्चों की मनास्थिति को जानकर अपने(अध्यापक) के हाव-भावों पर ध्यान जाए बिना नहीं रह सकता।अध्यापक को सदैव मृदु भाषी होना चाहिए। कक्षा में प्रवेश करते समय या विद्यालय में स्वयं को सहज रखना चाहिए। कबीरदास जी 15 वी शताब्दी में कह गए:-
             “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
             अपना तन सीतल करें,  औरन को सुख होई।“
एक शिक्षक ही तो छात्रों के हित और उसके व्यक्तित्त्व का समुचित विकास करने में अग्रणीय योगदान निभाता है।हम स्वयं सोच सकते हैं अगर हमारे भूरे-भयानक, भद्र हाव-भाव कहीं-न-कहीं छात्रों को उनके संशयों का निवारण करने में प्रतिबद्ध कर रहें हैं तो हम अच्छा अध्यापक बनने वाली राहों से कोसो दूर हैं। लगातार संदेहों का निवारण न किया जाए तो यह उसी प्रकार हो जाता है जब बीमारी पर पर्याप्त समय पर द्वा न मिलने पर वह नासूर,लाइलाज हो जाती है।
विध्यार्थी के कार्य शिक्षक की काबिलियत का बखान भी करते हैं। सहनशीलता का अध्यापक में होना जैसे फलों/गुणो से लदे हुये पेड़ के समान हैं जो समाज के सुनियोजित एवं सुरक्षात्मक निर्माण का संदेश भी है। सहनशील एवं धैर्यवान अध्याप्क के हाव- भाव कभी भद्र या रुद्र नहीं हो सकते। अध्यापक तो भगवान समान समझा जाता है जो हमारी भावी पीढी का निर्माण करता है।
‘’तेरा मार्गदर्शक हूँ मैं,
समुन्नत समाज की कल्पना कर
  मर्यादाशील रह कर,
      स्वयं जल जल कर,
अपने विद्यार्थियों का
आत्म-विश्वास, मनोबल
 बढाता चला जाऊँगा।‘’

(लेखिका- रजनी शर्मा)


कोविड

                        कोविड 2019
'Co' से कोविड 'Vi' से वायरस 
कोविड नाम WHO ने 11 feb,2020 को दिया। इस बीमारी की शुरुआत 31 dec 2019 को चीन के एक शहर वुहान (Wuhan) से हुई और पूरे विश्व में फैल गयी। coronavirus ऐसे विषाणु हैं जिनका संबंध ऐसे विषाणुओं के परिवार से है जो व्यक्ति के फेफड़ो पर सीधा प्रभाव डालते हैं और सांस की नली से होकर सीधा व्यक्ति के शरीर में घुस जाते हैं।यह  विष्णु (SARS Severe acute respiratory syndrome). यह एक अजीब और नई निमोनिया के प्रकार की बीमारी है जिसका संक्रमण एक व्यक्ति से अनेक में फैलता है। अब तक इसकी कोई दवा तैयार नहीं हुई है। नामी गिरामी दवा कम्पनियाँ इसकी खोज में दिन रात कार्यरत है।
                        अगर हम अपने देश भारत की बात करें तो यहाँ सबसे पहला कोरोना का मामला दक्षिण भारतीय राज्य केरल में सामने आया। एक मेडिकल की छात्रा जो 20 वर्ष की थी वह कोरोना पॉजिटिव पाए जाने से पहले wuhan, china से 25 जनवरी 2020 को लौटी थी।
         इस संक्रमित बीमारी को लेकर बहुत सारी आशंकाएं भी पनप रही थी कुछ को यह लग रहा था हमें कुछ नही होगा,संक्रमण नही फैलेगा और लापरवाही बरती जा रही थी फलस्वरूप हालात बिगड़ते गए एवम वायरस तेजी पकड़ता गया। देश में लॉक डाउन किये गए जिसके अंतगर्त किसी को भी घर से बाहर जाने की अनुमति नही थी। कोरोना कहीं भयानक रूप न ले ले इस पर नियंत्रण पाने के लिये सरकार ने बहुत से निर्णय लिए जैसे सबको स्वच्छ रहने मास्क पहनने, PPE किट का प्रयोग,बार-बार हाथ धोने को कहा।सबसे असाधारण निर्णय lockdown था।
                इस महामारी के खिलाफ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 24,मार्च 2020 को घोषणा की देशभर में 25 मार्च,2020 से 14 अप्रैल 2020(21 दी) तक lockdown रहेगा। स्थिति न सुधरने पर इसको तीन बार ओर बढ़ाया गया।
15 अप्रैल,2020 से 3,मई,2020 (19 दिन)
4मई,2020 से 17,मई 2020 (14 दिन)
18 मई,2020 से 31 मई,2020 (14 दिन)
  
इस लेख की और जानकारी अगले लेख में होगी पढ़ते रहे blog
(Dahleez bhawnaon ki.blogspot.com)
Rajni Sharma (lekh).

आलेख

आलेख- बचपन क्यों नहीं बचपन जैसा

                  बचपन क्यों नहीं बचपन जैसा बचपन एक ऐसी सरल एवं सहज अनुभूति है जिसका स्मरण आते ही मन हिलोरे खाने लग जाता है। मान...