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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

’’मैं पूछती हूँ’’


’’मैं पूछती हूँ’’        
मैं पूछती हूँ सूरज से
क्या सीखाया अब तक तूने,
कहाँ है रोशनी जगत में
आज भी तो पाप के अंधेरों में
सो रही है मुहँ छिपाये कहीं दुनिया,
भ्रष्टाचार, दिखावा,निरादर,बाल शोषण
जैसी
अंतस दहलाने वाली सपर्-सी मानसिकता
बैठी है बिलों में,
वक्त-बेवक्त कब डस ले
कौन जाने।
मैं पूछती हूँ चाँद-से,
कहाँ है तेरी कहकशा,
थोड़ी ठंडक भी,
आज भी तो ज्वाला,ईष्यार्,द्वेष,
सीने से लगाये बैठे हैं जन,
कब कौन-सा खंजर घोंप दे,
कुचल दे भावनाओं को।
मैं पूछती हूँ दीपक से,
स्वंय जल जल कर भी तो
सिखा न पाया आलोक फैलाना,
आज भी तो औछी मानसिकता,
बुझा रही है दीप घरों के,
बेपरवाह,
मैं पूछती हूँ पुष्पों से,
बदलते मौसम के साथ,
कितनी ही बार तु जन्मा
फिर मुरझाया,
मंद समीर के झौंकों सेे
चारों दिशाओं में महकाया,
कितने असमथर् रहे
फिर भी सौरभ फैला न
पाये हृदय में,
आगे निकलने की होड़ में
मक्कारी,झूठे, अपशब्दों-सी
दुगर्ंध है सीनों में।

नामः- रजनी शर्मा 








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