बचपन क्यों नहीं बचपन जैसा
बचपन एक ऐसी सरल एवं सहज अनुभूति है जिसका स्मरण आते ही मन हिलोरे खाने लग जाता है। मानो तपती गर्मी के मौसम में ठंडी हवा का झोंका सा चला हो। पल भर के लिए वापिस बचपन में ही लौटने की इच्छा सी उत्पन्न होती है। एक बार फिर से बचपन जीने का मन करता है। परंन्तु ऐसा केवल उन्ही व्यक्तियों के साथ होता है जिनका बचपन बचपन जैसा रहा हो।
हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चूके हैं हमारे कदम आधुनिकता एवं विकास की ओर तीव्र गति से बढ रहें हैं इस बीच बचपन क्यों नहीं बचपन जैसा विषय पर कोई भी विचार नही कर रहा केवल आगे बढने की होड़ चारो ओर लगी हुई है जिसके बीच एक खुबसूरत एहसास वाला बचपन कहीं खोया सा नजर आता है। हम कब बड़े हो जाते हैं पता ही नही चलता।
बचपन की यादों की बात करें तो सबसे पहले मस्तिष्क में दादा दादी नाना नानी की छवि उभरती है जिनके प्यार और संस्कारों के बीच बचपन गुजरता हुआ जवान होता है परन्तु आज एकल परिवार की सरंचना ने बचपन की इस छवि को बेमन छीन सा लिया है।
आज के प्रतियोगी युग में अभिभावक यह चाहते हैं कि उनका बच्चा हर क्षेत्र में आगे हो । आगे की अफरा तफरी में उसकी मासूम मानसिकता एवं बोधिकता की श्रेणी को नजर अंदाज़ करते हुए जाने कौन कौन सी कक्षाएँ लेने को विभिन्न संस्थानों में भेजते हैं ।पूरा दिन व्यस्त बच्चा कब अपना बचपन खो देता है पता ही नही चलता।
कांचों और गुल्ली डंडे जैसे खेलों भी बचपन जड़ा होता है। खूले आसमान के बीच अपने दोस्तों के साथ घंटों खेलना भी बचपन की छवि उभरता है।
बढती हुई बाल शोषण जैसी घातक समस्या भी बचपन को बचपन जैसा नहीं रहने देने में एक नकारात्मक भुमिका निभा रही है। अभिभावक अपने बच्चों को एकला घर से बाहर खेलने जाने देने में परहेज़ करते हैं। आये दिन अखबारों में बाल शोषण को लेकर कितनी घटनाएँ पढने को मिलती है जिससे बच्चों के प्रति सचेत होना पड़ता है। एकांत कोई स्थान पर बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं है और बच्चे भी कहीं न कहीं इस भय में रहते हैं और बाहर मित्रो के साथ खेलने में परहेज़ ही बरतते हैं। घर और विद्यालय की चाहर दिवारी के मध्य कब उनका बचपन पंख लगाकर जिंदगी रूपी घोंसलें से उड़ जाता है पता ही नही चलता।
बचपन की यादें सुनहरी यादों के रूप में संजोई रहें इसके पीछे परिपूर्ण परिवार और अभिभावक मुख्य भूमिका निभाते हैं। कुछ परिवार अपना ध्यान केवल लड़ाई झगड़ो की ओर ही रखते हैं उनके बच्चों के मस्तिष्क पर उनके मतभेदों का गहरा प्रभाव पड़ता है। समय से पहले ही परिपक्वता उनका दामन पकड़ लेती है या बूरी आदतें उनका बचपन का विशेष हिस्सा रोंद कर रख देती है। जिसका भुक्तान आजीवन भोगना पड़ता है। मतभेदों के दरमियाँ जूझता हुआ बचपन कसोटी बन जाता है।
इस आधुनिक दौर में बचपन क्यों नहीं बचपन जैसा चर्चा का विषय है। हमें बच्चों के बचपन को बचपन जैसा बनाये रखने में सहयोग देना होगा।
रजनी शर्मा (लेखिका)
अध्यापिका जम्मू कश्मीर शिक्षा विभाग
