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शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

आलेख-कमाऊ स्त्री एक शोध


                   कमाऊ स्त्री - एक शोध
एक ओर तो नारी सशक्तिकरण के द्वीप प्रज्वल्लित होते रहने की कामना आज सारा समाज करता है। बेटी पढ़ाओ,बेटी बचाओ ,बेटियों को स्वंय के पैरों पर खड़े करने जैसी मानसिकता आज के अभिभावकों के सर पर चढ़ कर बोल रही है। महिलाए पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर कार्यक्षेत्रों में सफलता के झण्डें सतत् गाढ़ रही रही हैं। कुछ कामघार महिलाओं से उनके जीवन और उनसे सम्बंधित संबंधों के बारे में पूछा गया तो सबके विभिन्न अनुभव थे।किन किन दबावो और विचारों के बीच घूमती उनकी सोच जो शायद कभी सामने आ जाती है तो कभी दम घोट लेती है।समाज को सुखद अनुभव दर्शाने वाली कामघार महिलाएं किन परिस्थितियों के मध्य जीवन जीती हैं। कुछ भाव जो परिवार और समय की उधेड़बुन में दमित होकर नव भावों के मध्य धीमी साँसे लेते रहते हैं।न तो उन भावों को कोई समझना चाहता है और न ही कोई समझने.बुझने का प्रयास करत है।सम्भवत: यह लेख उन भावों एवम् जरूरतों को जुबान देने का माध्यम बन सके।
कामघार महिलाएं,सम्बन्ध और चुनोतियाँ:-
* फीके पड़ते अधिकार
* बेबुनियादी शक का घेरा
* सबंध और उनकी आकांक्षाएं
* ईर्ष्या की भावना
अधिकतर  कामघार महिलाओं का कहना था  घर परिवार पर होने वाले व्यय की जिम्मेवारी लेने में उनके पति आँख मिचौनी का खेल खेलते हैं। अपना अधिकार हम पर तो समझते हैं परन्तु हमारी आकांक्षाएं कहीं न कहीं समय क साथ लुप्त हो जाती हैं एवम् अधिकार फीके पड़ जाते हैं।और आपसी रिश्तों में मेरा तेरा जैसी भावनाएं उत्पन्न होने लगती हैं।
                कितने रिश्ते सन्देह के आधार पर बली चढ़ जाते हैं। कामकाजी महिलाओं से बात करने पर पता चला ज्यदातर महिलाएं संदेह रुपी समस्या से आये दिन रूबरू हो रही हैं।उनके फ़ोन पर बात करते वक्त घरवालों की नजरें कहीं निशाना कहीं जैसे रोज़ की बात हो गयी है।राह गुजरते कोई कार्यकारी मिल जाए तो बाल की खाल उतारने लग जाते हैं।ऐसा लगता है मानो आत्मा बेबुनियादी शक की चिता में जल रही हो।
            जब एक लड़की 20.25 वर्ष अपने माता.पिता के पास रहती है वहीं पलती और आँखों में जाने कितने सपने लिए बड़ी होती है। जब बात विवाह की आती है तो मन ही मन वह अपने एक और माता पिता की छवि अपने मन में बनाने लग जाती है। उसे लगता है उसके पिता से अधिक प्रेम करने वाला जीवन साथी उसे मिलने वाला है जाने कितनी आशायें आकांक्षाएं लिए वह ख़ुशी .ख़ुशी अपने पति के घर  आ जाती है।वह बेझिझक अपनी जरूरतों को अपने पति को बताती है परन्तु इस शोध से यहां चीजें विपरीत दिशा में नज़र आती हैं।कुछ कामघार महिलाओं से बात करने पर पता चला ज्यदातर महिलाओं का कहना था वह अपनी जरूरतों को स्वयं पूरा करने में ही आनंद का अनुभव करती हैं वे अपने अधिकार पर झिझक महसूस करती हैं।आकांक्षाएं तो  कहीं किसी समय रुपी पथरों के नीचे दब जाती हैं । जब उनके जीवनसाथी की आँखों और व्यवहार से यह झलकता हो की तुम भी तो कमाती हो। उस वक़्त हम कामघार महिलाएं अपनी तुलना घरेलू महिलाओं से करने लग जाती हैं जिनके पति उनकी हर जरुरत को अपनी जरुरत समझकर पूरा करते हैं।घरेलू महिलाएं कहीं बेहतर स्थिति पर नज़र आने लगती है। घर परिवार संबंधों की  आकांक्षाएं भी अपनी काम काजी बहु बेटी पर बरकरार रहती है । मगर उसकी इच्छाएं तेज हवा में उड़ते तिनके समान होती हैं जिसे कोई थाह नहीं मिल रही होती।
                कामघार महिलाओं की मासिक आमदनी भी कभी- कभार सबंधों में कड़वाहट उत्पन्न करने में जिम्मेवार होती हैं।परिवार में रहते हुए महिला की अधिक आमदनी ईर्ष्या की भावना जागृत करने में एहम भूमिका निभाती है। लड़ाई-झगड़ो का कारण भी बनती है। ईर्ष्या आपसी निजता एवम् प्रेम का गला घोटने का कार्य करती है। अलगाव की परिस्थितियां भी उतपन्न हो जाती हैं। जो दुःख का विषय है। 
   अतः समाज में रहते हुए अगर मनुष्य अपने सम्बन्धों की जिम्मेवारी  भली-भाँती पहचानते हुए जीवन यापन करे तो ऐसी परिस्थितियाँ कभी हमारे घर का दरवाजा नहीं खटखटायेंगी ।

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