अध्यापक की आकांक्षा
जब भी ’अध्यापक’ शब्द कहीं सुनाई देता है,या अपना ही कोई अध्यापक राह चलते मिल जाये या कभी स्वयं को एक आदर्श अध्यापक के रूप में देखती हूँ तो अक्सर ज़हन में कुछ परिभाषाएँ उभरने लगती है जैसे कि प्रसिद्ध आलोचक डाॅ नामवर के अनुसार,’’विद्यार्थी दीवार पर लगी एक खंूटी के समान होते है,अध्यापक पर निभर्र करता है कि खंूटी पर मैले कपड़े टांगता है या साफ’’
एक परिभाषा तो जैसे मस्तिष्क में हिलौरे ही लेती रहती है,’’अध्यापक एक जलती मोमबत्ती के समान होता है जो स्वयं जलकर एक उज्जवल भविष्य का निमार्ण करता है।’’ प्रश्न यह उठता है कि क्या आधुनिक विद्यार्थी अपने अध्यापक की कशमकश,उसकी आशाँए , आकांक्षाँए समझ कर उस पर खरा उतरने की कितनी ही कोशिश करता है? इस बात का उत्तर अगर विद्यार्थी स्वयं ही खोजे तो ही बेहतर होगा।प्रत्येक शिक्षक की अभिलाषा होती है कि उसका हर छात्र शिष्टाचार,अनुशासन,आज्ञावान जैसे गुणों से परिपूर्ण हो।एक शिक्षक भरपूर प्रयत्न करता है कि जिन अवसरों से वह कभी वंचित रहा है या जो असमथर्ता वो अपने में कभी पाता है वह उसके छात्र में न आयें। जीवन के पग-पग पर सफलताँए उसके विद्यााथिर्यों के कदम चूमें। प्रत्येक क्षेत्र में उसका छात्र स्वयं को समथर् पाये उसके लिए वह विद्यालय में रहकर ही अनेकानेक अवसर प्रदान करता है।समय आने पर अध्यापक मित्र भी बन जाता है। अध्यापक अपने छात्रों के प्रति समपिर्त रहता है। वह विद्यालय से घर जाकर भी छात्रों के बारें में सोचता है ’’कल क्या पढ़ाना है’’ समय निकाल कर उसका अध्ययन भी करता है।इतना करने के बाद चंद छात्र जब अध्यापक का कहना नहीं मानते या अवमानना करते हंै तो अध्यापक जो छाात्रों के भविष्य निमार्ण और उनके माध्यम से पूरे देश व संसार के भविष्य निमार्ण के लिए आधार भूमि बनाने का कायर् करता है उसको गहरी चोट पँहुचती है।अध्यापक अपने दायित्व पूरी तरह से निभाता हुए भविष्य को केन्द्र में रखते है।
प्रत्येक छात्र व व्यक्ति को समझना चाहिए कि उसकी सफलता के पीछे,जहाँ वह खड़ा होकर एक समाज कहलाता है उसके पीछे केवल एक अध्यापक का ही योगदान है।अगर अध्यापक न होता तो शायद खूंटी पर मैले कपड़े भी टांगे जा सकते थे।अध्यापक ही अपनी समझ से विद्याथीर् का एक चमकते हुए हीरे के समान निमार्ण करता है बदले में केवल मान सम्मान चाहता है यही अध्यापक की आकांक्षा है।
बस एक ही अभिलाषा है मेरी,
मान,शिष्टाचार व नैतिक मूल्यों को
गहना तु बना ले..............
मेरे ज्ञान का भरपूर प्रयोग कर
ऊँची मंजिल को तु छू ले....................
लेखिका-रजनी शर्मा (अध्यापिका)

Guru Brahma...
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